Principles of Raag राग के सिद्धांत

Principles of Raag

The origin of each raga is attributed to some or the other Thaat.

A raga can have at least 5 or more 7 swaras. The Audav of 5-swar, the Shadav of 6-swaras and the Sampurna is of 7-swaras are considered. A combination of these three castes led to the formation of 9 castes.

The most prominent swar of the raga is called the Vaadi, Samvadi is the less prominent swar than Vaadi and the other swaras used in the raga called Anuvadi. Swaras not used in raga are called Vivadi.

To increase the pigmentation of a raga, sometimes a Viwadi swar is used, such as Komal Ni in Kedar, Tivra Ma in Bihag, etc.

Each raga has definite thaat, vadi samvadi, jati, aaroh avaroh, singing time, chalan and the swaras used, which must be followed.

Although the time of all the ragas is fixed, some ragas are sung every time in a particular season like Raga Bahar in spring.

If the swar of a raga is from the Purwang (Sa Re Ga Ma Pa) of the octave, that is to say, then its singing time will be 12:00 pm to 12:00 am. On the contrary, if his swar is from the Uttarang ( Ma Pa Dha Ni Sa°) of the octave, then his singing time will be from 12:00 am to 12:00 pm.

The Vaadi Samvadi of Each raga has a swar in each of the two parts of the octave. Just as the Vaadi is in the Purvang of the octave, then Samvadi will be in the Uttaraang.

The Vaadi and Samvadi have a distance of at least 3 and at most 4 swaras.

Just by considering the Vaadi as Samvadi and Samvadi as Vaadi, the time, behavior and nature of the raga changes completely, such as Bhoopali and Deshkar. Ga-Dha in Bhoopali and Dha-Ga in Deshkar are Vaadi and Samvadi.

In any raga, Suddh Ni has not been considered as a Vaadi and Tivra Ma is not a considered as a Vaadi or Samvadi.

The simultaneous use of both forms of any swar in the raga is forbidden. An exception to this rule is the use of the two together in the raga Lalit.

In ragas in which both the forms of a swar are used, the pure form is used in the Arohan and  Vikrit form in the Avarohan, such as Khamaj, Vrindavani Sarang, Desh etc.

The raga which enters from one Thaat to another is called Parmel Parveshak Raga. Such as Jaijaiwanti and Multani.

Ashray ragas are those ragas based on which naming of Thaats is made. Example: Kalyan, Kafi, Bhairav, Bhairavi etc.

In any raga, Ma and Pa are not forbidden together. If fifth forbidden in any raag, then Ma will be present whether it is Shuddh or Tivra.

The Chalan of serious ragas is more prevalent in the Purvangas of the Mandra and Middle Octaves and the Chalan of Fickle Raag in the Uttaraang and Taar Saptak of the Mid-Octave.

To increase the pigmentation of the raga, sometimes the shadow of other ragas is shown, which is called Tirobhav-Aavirbhav. This action is not mandatory for any raga.


राग के सिद्धांत

प्रत्येक राग की उत्पत्ति किसी न किसी थाट से मानी गई है।

राग में कम से कम 5 या अधिक 7 स्वर हो सकते हैं। 5 स्वर वाले राग की जाती औेडव, 6 स्वर वाले राग की जाति षाडव और 7 स्वर वाले राग की जाति संपूर्ण मानी गई है। इन्हीं तीनों जातियों के सम्मिश्रण से 9 जातियां बनी।

राग का सबसे प्रमुख स्वर वादी, उससे कम प्रमुख संवादी और राग में लगने वाले अन्य स्वर अनुवादी कहलाते हैं। राग में प्रयोग नहीं किए जाने वाले स्वर को विवादी कहते हैं।

राग की रंजकता बढ़ाने के लिए कभी-कभी विवादी स्वर का प्रयोग होता है जैसे केदार में कोमल नि, बिहाग में तीव्र म इत्यादि।

प्रत्येक राग का थाट, वादी संवादी, जाती, आरोह अवरोह, गायन समय, चलन और प्रयोग किए जाने वाले स्वर निश्चित होते हैं, जिनका पालन करना आवश्यक होता है।

यद्यपि सभी रागों का समय निश्चित है फिर भी कुछ राग किसी विशिष्ट ऋतु में हर समय गाय बजाए जाते हैं जैसे बसंत ऋतु में राग बहार।

अगर किसी राग का वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग अर्थात सा रे ग म प से होता है तो उसका गायन समय दिन के पूर्वार्ध (12:00 बजे दिन से 12:00 बजे रात्रि तक) मे किसी समय होगा। इसके विपरीत अगर उसका वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग (अर्थात म प ध नि सां) से होता है तो उसका गायन समय भी दिन के उत्तरार्ध (12 बजे रात्रि से 12 बजे दिन तक) में होगा।

प्रत्येक राग का वादी संवादी सप्तक के दोनों अंगों में एक एक स्वर होता है। जैसे वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में है तो संवादी स्वर उत्तरांग में होगा।

वादी और संवादी स्वर में कम से कम 3 और अधिक से अधिक 4 स्वरों की दूरी होती है।

केवल वादी को संवादी और संवादी को वादी मानने से राग का समय, चलन और स्वरूप आदि बिल्कुल बदल जाता है, जैसे – भूपाली और देशकार। भोपाली में ग-ध और देश्कार में ध-ग वादी संवादी हैं।

किसी भी राग में सुद्ध नि को वादी और तीव्र म को वादी या संवादी नहीं माना गया है।

राग में किसी भी स्वर के दोनों रूपों का एक साथ प्रयोग वर्जित है। राग ललित में दोनों का एक साथ प्रयोग इस नियम का अपवाद है।

जिन रागों में किसी स्वर के दोनों रूप प्रयोग किए जाते हैं तो शुद्ध रूप आरोह में और विकृत अवरोह में प्रयोग किया जाता है, जैसे- खमाज, वृंदावनी सारंग, देश आदि।

जो राग एक थाट से दूसरे थाट में प्रवेश कराते हैं उसे परमेल प्रवेशक राग कहते हैं। जैसे जयजयवंती और मुल्तानी।

जिन रागों के आधार पर थाटों का नाम रखा गया है वे आश्रय राग कहलाते हैं। जैसे- कल्याण, काफी, भैरव, भैरवी इत्यादि।

किसी भी राग में म और प एक साथ वर्जित नहीं होते। किसी में पंचम वर्जित है तो म अवश्य लगेगा चाहे म शुद्ध हो या तीव्र।

गंभीर रागों की चलन मंद्र और मध्य सप्तक के पूर्वांग में तथा चंचल रागों की चलन मध्य सप्तक के उत्तरांग और तार सप्तक में अधिक होती है।

राग की रंजकता बढ़ाने के लिए कभी-कभी अन्य रागों की छाया दिखाई जाती है, जिसे तिरोभाव-आविर्भाव कहते हैं। यह क्रिया किसी भी राग के लिए अनिवार्य नहीं है।

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