How to do singing practice at the time of the examination and how long should we practice परीक्षा के वक़्त किस प्रकार से और कितनी देर रियाज़ करना चाहिए

This is truth

This is truth that it is very difficult to find time at the time of the examination, but in this you have to find time for Riyaz. Those who are not lazy, they just take the time out, but it is very difficult for the lazy people to handle time.

You will have to sit for a minimum of time from the beginning for your exam or study so that you do not have the pressure to study when the examination takes place. Riyaz will also have to be careful about it everyday in order to maintain his habit of singing, Do not leave for 30 minutes or one hour or 2 hours daily, in the time of the examination.

I believe that

I believe that in 24 hours, no person does complete studies, so does 24 hours no riyaz. It is time to use and handle it, according to the situation on how much time it is said to think itself. But it is important to be Riyaz everyday.

It is his own view that whose value is high in his heart, he who values Riyaz will do more than Riyaz, and who studies the importance, he will do more. But I have to say that both are essential things, so it is wise to take both of them equally.


ये सही बात है

ये सही बात है कि परीक्षा के वक़्त समय मिल पाना बहुत मुश्किल है, लेकिन इसी में रियाज़ भी करना होता है। जो अलसी नहीं हैं वो तो ठीक समय निकाल ही लेते हैं, लेकिन अलसी लोगो के लिए बहुत मुश्किल है समय को संभालना।

आपको अपने परीक्षा या पढ़ाई के लिए शुरू से ही थोड़ा वक़्त निकालकर रोज बैठना होगा ताकि परीक्षा आने पर पढ़ाई का दबाव ना आ जाए। रियाज़ को भी रोज करके संभलकर रहना होगा ताकि आदत बनी रहे गायकी का। परीक्षा के समय में रोज जितना वक़्त मिले ३० मिनट या १ घंटे या २ घंटे रियाज़ करते रहना है, छोड़ना नहीं है।

मेरा मानना है

मेरा मानना है कि २४ घंटे में कोई भी इंसान पूरा पढ़ाई नहीं करता है, इसी तरह २४ घंटे कोई रियाज़ भी नहीं करता है। तो वक़्त को संभलकर उपयोग करना है, खुद सोचना की कितना वक़्त कहा पर लगाए परिस्थिति के अनुसार। पर रियाज़ हर रोज होना जरूरी है।

ये अपना अपना नजरिया है कि किसके दिल में किसका महत्व ज्यादा है, जो रियाज़ को महत्व देता है वो रियाज़ ज्यादा करेगा, और जो पढ़ाई को महत्व देता है वो पढ़ाई ज्यादा करेगा। पर मेरा कहना है कि दोनों ही जरूरी चीज़े हैं, इसलिए दोनों को समान रूप से लेकर चलना ही बुद्धिमानी है।


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